
शिमला। हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति को लेकर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू लगातार राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) का मुद्दा उठाते हुए केंद्र सरकार से आर्थिक मदद की मांग कर रहे हैं। सरकार की ओर से प्रदेश की खराब वित्तीय स्थिति और आरडीजी नहीं मिलने से बढ़ रहे आर्थिक दबाव का हवाला दिया जा रहा है। वहीं, दूसरी ओर करीब 20 करोड़ रुपये की लागत से मुख्यमंत्री कार्यालय बनाए जाने तथा मंत्रियों के लिए भी नए कार्यालय तैयार किए जाने की योजना को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
विपक्ष का कहना है कि एक तरफ सरकार प्रदेश की आर्थिक हालत खराब होने, राजस्व घाटा बढ़ने और आरडीजी नहीं मिलने का रोना रो रही है, वहीं दूसरी तरफ करोड़ों रुपये की लागत से नए कार्यालयों का निर्माण किया जा रहा है। ऐसे में सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। विपक्ष का तर्क है कि यदि प्रदेश वास्तव में गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है तो सरकारी धन का इस्तेमाल ऐसे कार्यों पर किया जाना चाहिए, जिनसे सीधे तौर पर आम जनता, कर्मचारियों, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास कार्यों को लाभ मिल सके।
करीब 20 करोड़ रुपये की लागत से मुख्यमंत्री कार्यालय तैयार किए जाने के बाद अब मंत्रियों के लिए भी कार्यालय बनाए जाने की बात सामने आ रही है। इससे सरकारी खर्च और वित्तीय प्राथमिकताओं को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि जब सरकार प्रदेश की आर्थिक स्थिति को लेकर केंद्र से लगातार सहायता की मांग कर रही है, तो ऐसे समय में करोड़ों रुपये की लागत वाले नए कार्यालयों का निर्माण कितना जरूरी है।
इसी बीच छोटा शिमला चौँक में सड़क को भी चौड़ा किया जा रहा है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत राजीव गांधी की किनारे पर लगी प्रतिमा को छोटा शिमला चौँक के बीचों-बीच लगाने की मंशा से सड़क को चौड़ा किया जा रहा है। इसको लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल अपने नेताओं को खुश करने के लिए किया जा रहा है। यदि सड़क चौड़ीकरण और प्रतिमा लगाने के लिए सरकारी धन खर्च किया जा रहा है, तो इसकी लागत, स्वीकृति और आवश्यकता को लेकर सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
विपक्ष का आरोप है कि एक तरफ प्रदेश में आर्थिक संकट का हवाला देकर शिक्षण संस्थानों को बंद किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार पर अपने करीबियों और राजनीतिक हितों से जुड़े लोगों को खुश करने के लिए सरकारी धन खर्च करने के आरोप लग रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि सरकार को सबसे पहले शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े क्षेत्रों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
आरडीजी नहीं मिलने को लेकर सरकार की ओर से प्रदेश के वित्तीय हितों पर असर पड़ने की बात कही जा रही है। ऐसे में जनता के बीच यह सवाल भी चर्चा का विषय बन रहा है कि यदि आर्थिक संसाधन सीमित हैं तो सरकार को खर्च की प्राथमिकताएं किस आधार पर तय करनी चाहिए। एक तरफ आरडीजी के लिए केंद्र से मदद की मांग और दूसरी तरफ करोड़ों रुपये के नए कार्यालयों का निर्माण-इन दोनों परिस्थितियों के बीच सरकार की वित्तीय नीति को लेकर विपक्ष ने सवाल खड़े किए हैं।
अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार इन निर्माण कार्यों की आवश्यकता, लागत और प्राथमिकता को लेकर क्या स्पष्टीकरण देती है और जनता के पैसों के इस्तेमाल को लेकर उठ रहे सवालों का किस तरह जवाब देती है।




Anjana
Good