
पाक्योंग, सितंबर: हिमाचल प्रदेश के मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने आज सिक्किम के पाक्योंग जिले के दक्षिणी रेगु गांव का दौरा कर राज्य में बडी इलायची (Large Cardamom) की खेती, उत्पादन और किसानों को दी जा रही सहायता के बारे में जानकारी प्राप्त की।
प्रतिनिधिमंडल को स्पाइसेज बोर्ड, सिक्किम के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. टीकेन्द्र डेका ने बडी इलायची की वैज्ञानिक खेती, उपयुक्त जलवायु, उत्पादन प्रक्रिया तथा किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। फेलो साइंटिस्ट नीलम ने भी किसानों को उपलब्ध कराई जा रही सहायता तथा पुनःरोपण संबंधी गतिविधियों के बारे में जानकारी साझा की।
बडी इलायची को सिक्किम की प्रमुख नकदी फसलों में शामिल किया जाता है। कृषि विभाग, सिक्किम के अनुसार, बडी इलायची का वैज्ञानिक नाम Amomum subulatum Roxb. है और यह Zingiberaceae परिवार से संबंधित है। यह मुख्य रूप से उप-हिमालयी सिक्किम और पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग क्षेत्र में उगाई जाती है तथा उत्तराखंड और पूर्वोत्तर के कुछ पर्वतीय राज्यों में भी इसकी खेती होती है। नेपाल और भूटान में भी इसकी खेती की जाती है। सिक्किम बडी इलायची के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में से एक है और भारतीय तथा वैश्विक बाजार में इसकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि बडी इलायची की खेती के लिए ठंडी एवं आर्द्र जलवायु अनुकूल होती है। सामान्यतः 600 से 2000 मीटर की ऊंचाई तथा लगभग 4 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान इसके लिए उपयुक्त माना जाता है। फसल की बेहतर उत्पादकता के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप उपयुक्त किस्म का चयन महत्वपूर्ण है। बडी इलायची की विभिन्न किस्मों तथा इसके प्रवर्धन की विभिन्न विधियों के बारे में भी प्रतिनिधिमंडल को जानकारी दी गई।
डॉ. डेका ने बताया कि बडी इलायची की रोपाई के लिए सामान्यतः अप्रैल से जून का समय उपयुक्त रहता है और पौधे लगभग दो वर्ष में फल देना शुरू कर सकते हैं। पौधे के पुष्पक्रम में सामान्यतः 30–40 फूल होते हैं। इसके फूलों के परागण में भंवरे (bumble bees) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फल कैप्सूल के रूप में विकसित होता है, जिसमें अनेक बीज होते हैं।
प्रतिनिधिमंडल को फसल में होने वाले रोगों, विशेषकर ब्लाइट जैसे फंगल संक्रमण, की रोकथाम तथा जैविक खेती की परिस्थितियों में किसानों द्वारा अपनाए जाने वाले निवारक उपायों के बारे में भी जानकारी दी गई। वैज्ञानिकों ने बताया कि बडी इलायची की जड़ों की गहराई अपेक्षाकृत कम होती है और पौधे के स्वस्थ विकास के लिए उचित प्रबंधन आवश्यक है।
डॉ. डेका ने प्रतिनिधिमंडल को बताया कि सिक्किम में बडी इलायची का उत्पादन लगभग 5,500 मीट्रिक टन के स्तर पर है और खेती के नए क्षेत्रों को भी इसके अंतर्गत लाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सिक्किम के साथ-साथ अरुणाचल प्रदेश भी बड़े इलायची उत्पादक क्षेत्र के रूप में उभर रहा है तथा क्षेत्रीय स्तर पर इसकी खेती के विस्तार और बाजार में प्रतिस्पर्धा से जुड़े पहलुओं पर भी कार्य किया जा रहा है।
मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने किसानों से बातचीत कर बडी इलायची की खेती से जुड़ी जमीनी चुनौतियों, उत्पादन और आजीविका के अवसरों को समझा। प्रतिनिधिमंडल ने बडी इलायची की कटाई के बाद होने वाली पारंपरिक सुखाने/क्योरिंग प्रक्रिया को भी समझा, जिसमें फसल को नियंत्रित ताप के माध्यम से सुखाकर बाजार के लिए तैयार किया जाता है।
इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने सिक्किम में मसाला फसलों के वैज्ञानिक विकास, किसानों को तकनीकी सहायता तथा बडी इलायची की खेती को अधिक उत्पादक और टिकाऊ बनाने के प्रयासों की जानकारी प्राप्त की। दौरे का उद्देश्य सिक्किम में कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आजीविका से जुड़े विकास कार्यों का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया।




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